नवाबों की ज़मीन, हार्वे का विजन और मजदूरों के 'कफन' में लिपटे बकाया अधिकार hussainabad news today
हुसैनाबाद (पलामू):
इतिहास की किताबों में लिखा है कि पलामू के विकास के लिए हुसैनाबाद की मुस्लिम रियासत के नवाबों ने अपनी बेशकीमती ज़मीन इस उम्मीद में सौंपी थी कि यहाँ की मिट्टी सोना उगलेगी और क्षेत्र का हर घर रोशन होगा। उस बुलंद सोच को सी.ए. हार्वे के अनुशासन ने परवान चढ़ाया। लेकिन आज, उसी ज़मीन पर खड़े होकर जब हम देखते हैं, तो दिल बैठ जाता है। कल-पुर्जे कट चुके हैं, ज़मीन के अंदर गड़ी मशीनें उखाड़ ली गईं, और पीछे छूट गए हैं तो बस—मजदूरों के ढहते हुए सपने और दरकती दीवारें।
1. सुनहरी नींव: नवाबों की बुलंद सोच और हार्वे का विजन
जपला सीमेंट फैक्ट्री (सोन वैली पोर्टलैंड सीमेंट कंपनी) का जन्म केवल मुनाफे के लिए नहीं हुआ था। इसके पीछे हुसैनाबाद की रियासत के नवाबों की वह दूरगामी सोच थी, जिन्होंने क्षेत्र के विकास के लिए अपनी बेशकीमती भूमि प्रदान की।
सी. ए. हार्वे (C.A. Harvey): नवाबों की दी हुई इस जमीन पर हार्वे साहब ने एक औद्योगिक क्रांति की रूपरेखा तैयार की। उन्होंने न केवल एशिया की आधुनिकतम फैक्ट्रियों में से एक खड़ी की, बल्कि एक अनुशासित टाउनशिप, अस्पताल और हार्वे स्कूल जैसा शिक्षा का मंदिर भी बनाया। यह वह दौर था जब 'जपला सीमेंट' की गूंज पूरे देश में थी।
2. क्या कहते हैं समाज सेवी नसीम खान:ज़मीन से उखाड़ ली गई 'तरक्की' की जड़ें
नीलामी के बाद जपला सीमेंट फैक्ट्री के साथ जो हुआ, वह किसी त्रासदी से कम नहीं। मुनाफे के भूखे हाथों ने फैक्ट्री का एक-एक कतरा, एक-एक कल-पुर्जा काट कर बेच दिया। यहाँ तक कि ज़मीन के सीने को चीरकर अंदर दबे लोहे और मशीनों को भी उखाड़ लिया गया ताकि 'नुकसान की भरपाई' की जा सके। लेकिन सवाल यह है कि उन मज़दूरों के नुकसान की भरपाई कौन करेगा, जिनकी तीन पीढ़ियाँ इस फैक्ट्री की सेवा में खप गईं?
3. नवाबों की 'मुस्लिम विरासत' और हार्वे का 'अनुशासन'
यह सिर्फ एक फैक्ट्री नहीं थी, यह सांप्रदायिक सौहार्द और विकास की एक साझा विरासत थी।
नवाबों की सोच: हुसैनाबाद के मुस्लिम नवाबों ने मज़हब से ऊपर उठकर इलाके की तरक्की के लिए अपनी पुश्तैनी ज़मीन दी थी। उनकी सोच "इलाकाई वफादारी" पर टिकी थी।
हार्वे का सपना: हार्वे साहब ने उस ज़मीन पर एक ऐसा साम्राज्य खड़ा किया जहाँ शिक्षा (हार्वे स्कूल) और स्वास्थ्य सर्वोच्च प्राथमिकता थे। आज आरबीसी न्यूज़ (RBC News) के पास मौजूद हार्वे साहब की तस्वीर और जर्जर बंगलों की दरारें चीख-चीख कर पूछ रही हैं—क्या नवाबों और हार्वे की इस साझा विरासत का अंत यही था?
4. दरकते बंगले और सिसकते मजदूर
फैक्ट्री के आलीशान अफसरों के बंगले आज भूतों का डेरा बन चुके हैं। उन दीवारों में आई दरारें दरअसल उन मजदूरों के भविष्य की दरारें हैं, जिन्हें आज तक अपना बकाया नहीं मिला। कई मजदूर अपने हक की गुहार लगाते-लगाते कब्रों में सो गए। नीलामी तो हुई, लेकिन मज़दूरों की किस्मत का फैसला आज भी अधर में लटका है।
5. विरासत को बचाने की चुनौती: अब पहल कौन करेगा?
नेताओं ने हर चुनाव में 'नई नीति' के नाम पर लोक-लुभावन वादे किए। बीजेपी हो या अन्य दल, 'जपला' सबके लिए सिर्फ एक चुनावी नारा बनकर रह गया।
विरासत का संरक्षण: नवाबों की उस बुलंद सोच को बचाने का एकमात्र तरीका यह है कि इस खाली पड़ी ज़मीन का इस्तेमाल इलाकाई युवाओं के रोजगार के लिए किया जाए।
रोजगार की मांग: क्या कोई ऐसा नेतृत्व सामने आएगा जो इस खाली ज़मीन पर फिर से औद्योगिक इकाइयाँ लगवा सके? क्या प्रशासन उन मज़दूरों के बकाये का हिसाब चुकता करेगा?
निष्कर्ष: इतिहास का न्याय बाकी है
इतिहास गवाह है कि जपला ने देश के निर्माण में अपना सीमेंट दिया था। आज वही जपला न्याय मांग रहा है। नवाबों की दी हुई ज़मीन आज भी मौजूद है, लेकिन वह 'रूह' गायब है जिसने इसे पहचान दी थी। हार्वे साहब की तस्वीर और ये खंडहर हमें चेतावनी दे रहे हैं कि अगर आज हम चुप रहे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।
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