मदरसा खैरुल इस्लाम में सरपरस्ती या सियासी दखल? Hussainabad news today rbc channel
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| सम्मान समारोह की फोटो एजाज हुसैन,व दिगर लोग |
एसी ऑफिस, बंद दुकानें, पगड़ी के खर्च और स्थानीय बच्चों की सुविधाओं को लेकर उठे सवाल
हुसैनाबाद | RBC Channel विशेष रिपोर्ट
ईद मिलादुन्नबी के मौके पर हुसैनाबाद में जुलूसे मोहम्मदी निकला। मदरसा खैरुल इस्लाम से निकले जुलूस में कई मोहल्ला से एकत्रित जुलूस में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। धार्मिक कार्यक्रम हुआ, तकरीरें हुईं और सैकड़ों युवाओं ने बढ़ चढ़कर अकीदत के साथ हिस्सा लिया।
लेकिन इसी बीच मदरसा खैरुल इस्लाम की व्यवस्था और संचालन को लेकर कुछ सवाल भी चर्चा में उस वक्त आ गए जब युवा नेता शेर अली ने खुद को मदरसा का सरपरस्त गांधी चौक के निकट गर्दाना । ये सवाल किसी मजहब या धार्मिक परंपरा के खिलाफ नहीं, बल्कि मदरसे की संपत्ति, संसाधनों और बच्चों के हित से जुड़े सवाल हैं।
सरपरस्ती की भूमिका पर सवाल
शेर अली साहब खुद को मदरसे का सरपरस्त बताते हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि सरपरस्ती की वास्तविक जिम्मेदारियां क्या हैं और संस्था के संचालन में सरपरस्त की भूमिका कितनी निर्धारित है।
मदरसे के कार्यालय में राजनीतिक लोगों की प्रति दिन लम्बे समय देर रात तक बैठकें होने की चर्चा है। यदि ऐसा होता है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि क्या इसके लिए कमेटी की अनुमति और कोई निर्धारित नियम है।
खासकर तब, जब बैठक के दौरान मदरसे के एसी, बिजली और अन्य संसाधनों का इस्तेमाल होता हो।
इन सुविधाओं का खर्च किस खाते में दर्ज होता है—यह स्पष्ट होना चाहिए।
पगड़ी बांधने के खर्च का स्रोत क्या था?
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| डॉक्टर एजाज आलम,इब्राहिम सेठ,मोइन खान आरजू खान व नगर अध्यक्ष अजय भारती |
धार्मिक कार्यक्रम में सामाजिक दायित्व का निर्वहन करने वाले व्यक्तियों के इलावा कुछ लोगों को अपने निजी स्वार्थ हेतु पगड़ी पहनाकर सम्मानित किया गया। यह सामाजिक परंपरा का हिस्सा हो सकता है।
लेकिन यहां भी एक वित्तीय,और दीनी ऐतबार से सवाल स्वाभाविक है—
जिन लोगों के सिर पर पगड़ी बांधी गई, उसके लिए होने वाला खर्च किस स्रोत से आया? क्या अतिथियों के गरिमा का ख्याल रखा गया, कहीं उनके सिर जकात और फितरा की रकम सिर चढ़ा तो नहीं दी गई।
क्या यह मदरसे के फंड से हुआ?
क्या जकात या फितरा की राशि इस्तेमाल हुई?
या फिर आम लोगों से अलग से चंदा लेकर यह खर्च पूरा किया गया?
अगर आवामी चंदे से खर्च हुआ तो कितना चंदा आया और कितना खर्च हुआ?
और अगर मदरसे के खाते से हुआ तो किस मद में दर्ज किया गया?
सवाल परंपरा पर नहीं,
खर्च के स्रोत और हिसाब पर है। सवाल यहीं खत्म लोगों ने नहीं किया,
मदरसे की बंद दुकानों से संभावित आय का सवाल?
मदरसे की संपत्ति में ऊपरी मंजिल की दो दुकानों के लंबे समय से बंद होने की बात भी सामने आ रही है।
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| मदरसे की बंद दुकानें वर्षों से |
यदि एक दुकान का संभावित किराया करीब ₹1,000 प्रतिमाह माना जाए, तो दो दुकानों से लगभग ₹2,000 प्रतिमाह और करीब ₹24,000 सालाना आय हो सकती थी।
चार वर्षों में यह अनुमानित राशि करीब ₹96,000 बैठती है। वर्तमान में किसी भी दुकान का किराया 2000 से कम नहीं सूत्र जो कहते हैं।
यह केवल संभावित गणना है। वास्तविक किराया और दुकानें बंद रहने का कारण मदरसा प्रबंधन ही स्पष्ट कर सकता है।
सवाल यह है कि अगर मदरसे की अपनी संपत्ति आय का साधन बन सकती है, तो वह लंबे समय से उपयोग में क्यों नहीं है?
बाहरी बच्चों की संख्या और स्थानीय बच्चों की सुविधा
मदरसे में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या को लेकर भी चर्चा है। बताया जा रहा है कि करीब 20 बच्चे बाहरी क्षेत्रों से आने वाले हैं।
यदि यह आंकड़ा सही है, तो एक अलग सवाल सामने आता है—
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| मदरसे के बच्चों की मुट्ठी भर तादाद |
जब बाहरी बच्चों के लिए ड्रेस या अन्य व्यवस्थाओं की बात होती है, तो स्थानीय बच्चों के लिए समान ड्रेस कोड और सुविधाओं की व्यवस्था क्यों नहीं?
मदरसा जिन बच्चों के लिए है, उनके बीच सुविधा का आधार क्या है?
क्या सभी बच्चों के लिए एक समान ड्रेस व्यवस्था है?
अगर नहीं, तो उसका नियम क्या है?
स्थानीय परिवार भी मदरसे की व्यवस्था में सहयोग करते हैं और समाज की आर्थिक भागीदारी भी इसमें रहती है। ऐसे में स्थानीय बच्चों को भी समान सुविधा मिलना स्वाभाविक अपेक्षा है।
यह किसी बाहरी बच्चे के खिलाफ सवाल नहीं है।
सवाल सिर्फ इतना है कि मदरसा सबका है तो व्यवस्था भी समान होनी चाहिए।
आय के स्रोत और उपयोग पर पारदर्शिता जरूरी
मदरसे की आमदनी में दुकानों का किराया, बच्चों से चंदा कराना, जकात, फितरा और आवामी सहयोग जैसे स्रोत बताए जाते हैं।
ऐसे में समाज के लोगों के मन में यह जानने की स्वाभाविक इच्छा हो सकती है कि संस्था की कुल आय कितनी है और उसका उपयोग किन मदों में होता है।
मदरसे का वार्षिक कैलेंडर: कैलेंडर पर सिर्फ सरपरस्त का नाम क्यों ? खजांची , सीक्रेट्री , सदर या अन्य संबंधित अधिकारियों का नाम गायब क्यों ? सलाना खर्च 1045815, आमदनी 1049700 है, यानी चार वर्षों के कार्य काल में आमदनी 4198800 लाख हुई।
मदरसे के लिए बेहतर शिक्षा व्यवस्था, बच्चों की सुविधाएं, भवन का रखरखाव, शिक्षकों की व्यवस्था और जरूरतमंद विद्यार्थियों की सहायता—इन सभी पर खर्च होना महत्वपूर्ण है। लेकिन जिन दुकानों से आय होती उसकी जिम्मेदारियां देखरेख मरम्मत खस्ता हाल ,ऐसा क्यों?
इसलिए आय-व्यय का पारदर्शी विवरण संस्था के प्रति लोगों का भरोसा और मजबूत कर सकता है।
सवाल कमेटी से भी
मदरसा केवल किसी एक व्यक्ति के नाम से नहीं चलता। संस्था की कमेटी, सचिव, खजांची और अन्य जिम्मेदार पदाधिकारियों की भी अपनी-अपनी जिम्मेदारियां होती हैं।
इसलिए इन सवालों का जवाब भी सामूहिक रूप से आना चाहिए—
मदरसा किस नियमावली के तहत संचालित है?
सरपरस्त की वास्तविक भूमिका क्या है?
आय-व्यय का हिसाब कौन रखता है?
ऑडिट की व्यवस्था क्या है?
मदरसे की संपत्तियों से होने वाली आय का इस्तेमाल किस तरह किया जाता है?
इन बातों की जानकारी सार्वजनिक होने से किसी पर आरोप नहीं लगेगा, बल्कि संस्था की पारदर्शिता मजबूत होगी।
RBC चैनल का सवाल जो जनता जानना चाहती है?
RBC चैनल किसी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं कर रहा है और न ही किसी राशि के दुरुपयोग का दावा कर रहा है।
लेकिन जब कोई संस्था जकात, फितरा, चंदे और समाज के सहयोग से चलती है, तो उसके संचालन में पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी हो जाती है।
इसलिए सवाल सीधा है—
मदरसा खैरुल इस्लाम की व्यवस्था में बच्चों की जरूरत सबसे ऊपर है या किसी अन्य गतिविधि की प्राथमिकता?
बाहरी और स्थानीय बच्चों के लिए सुविधाओं का पैमाना समान क्यों नहीं होना चाहिए?
पगड़ी सहित धार्मिक आयोजनों के खर्च का स्रोत क्या है?
मदरसे की संपत्ति का पूरा उपयोग क्यों नहीं हो रहा है?
इन सवालों का जवाब दस्तावेजों और स्पष्ट जानकारी के साथ सामने आता है तो तस्वीर खुद साफ हो जाएगी।
क्योंकि मदरसा किसी व्यक्ति की निजी जागीर नहीं, समाज की अमानत है।
RBC चैनल — सवाल जनता का, जवाब जिम्मेदारों का।




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