ASI रमन यादव का खाली नोटिस’ बना बड़ा सवाल: हुसैनाबाद चुनाव विवाद में पुलिस कार्रवाई, नामांकन रद्द और हाई कोर्ट की सुनवाई से पहले बढ़ा सियासी तापमन hussainabad news today
RBC न्यूज़ एक्सक्लूसिव
हुसैनाबाद (पलामू):
नगर निकाय चुनाव 2026 के परिणाम भले ही घोषित हो चुके हों, लेकिन हुसैनाबाद में चुनावी विवाद अब भी शांत नहीं हुआ है। इस पूरे मामले के केंद्र में एक ऐसा पुलिस नोटिस आ गया है जिसने प्रशासनिक कार्रवाई की वैधता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
हुसैनाबाद थाना के ASI रमन यादव द्वारा जारी 5/3/26 कि एक नोटिस, जिसमें हस्ताक्षर मुहर तो मौजूद हैं लेकिन कांड संख्या (FIR नंबर) पूरी तरह खाली है, अब पूरे विवाद का सबसे बड़ा कानूनी बिंदु बन चुका है।
RBC न्यूज़ को मिले दस्तावेज़ों और स्थानीय सूत्रों के अनुसार यह मामला अब केवल चुनावी विवाद नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक कार्रवाई, पुलिस की भूमिका और प्रेस की स्वतंत्रता पर भी गंभीर बहस छेड़ चुका है।
ASI रमन यादव का नोटिस: हस्ताक्षर हैं, लेकिन FIR नंबर नहीं
मामले की शुरुआत एक ऐसे नोटिस से हुई जिसे हुसैनाबाद थाना के ASI रमन यादव ने जारी किया।
बताया जाता है कि यह नोटिस BNSS की धारा 35(3) के तहत दिया गया है।
लेकिन नोटिस में एक महत्वपूर्ण कॉलम—कांड संख्या (FIR No.)—पूरी तरह खाली है।
यानी:
* नोटिस पर अधिकारी के हस्ताक्षर हैं
* तारीख दर्ज है
* लेकिन जिस केस के आधार पर नोटिस दिया गया, उसकी संख्या दर्ज नहीं है
कानूनी जानकारों के अनुसार यह प्रक्रिया कानून की दृष्टि से गंभीर सवाल खड़े कर सकती है।
उठते सवाल
* क्या बिना FIR नंबर के किसी नागरिक को थाने बुलाया जा सकता है?
* क्या यह प्रक्रिया कानून की निर्धारित औपचारिकताओं का उल्लंघन नहीं है?
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह का नोटिस कानूनी रूप से कमजोर या शून्य भी माना जा सकता है।
🚓 घर से उठाकर थाने ले जाने का आरोप
सूत्रों के अनुसार, इस मामले में केवल नोटिस ही नहीं बल्कि पुलिस कार्रवाई भी विवाद का विषय बन गई है।
स्थानीय लोगों का दावा है कि प्रत्याशी अजय पासवान को उनके घर से पुलिस द्वारा थाने ले जाया गया।
बताया जा रहा है कि:
* उन्हें बिना पूर्व सूचना ले जाया गया
* कई घंटों तक थाने में बैठाकर रखा गया
* नोटिस थमाया गया
मामला यहीं नहीं थमा ASI रमन यादव ने चार से पांच की तादाद में सुरक्षा बल लेकर उस जगह भी आनन फानन में पहुंच गए जिस जगह से विडियो लाइव की गई थी ।
* एक बड़ा प्रश्न : पत्रकार शेख मुजाहिद हुसैनाबादी को नहीं मिली है नोटिस जबकि एक ही आरोप में नामजद है दोनों ।
हालाँकि पुलिस की ओर से इस मामले पर आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी तक सामने नहीं आई है।
बताया जाता है कि अजय पासवान ने नामांकन रद्द होने के बाद स्थानीय न्यूज़ प्लेटफॉर्म RBC न्यूज़ को एक इंटरव्यू दिया था।
इस इंटरव्यू में उन्होंने चुनाव प्रक्रिया और प्रशासनिक फैसलों पर सवाल उठाए थे।
सूत्रों के अनुसार इसके बाद ही पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई तेज हो गई।
इस मामले में FIR में नाम शामिल होने की बात सामने आई: अजय पासवान RBC न्यूज़ के प्रोपराइटर और एंकर शेख मुजाहिद हुसैनाबादी पर FIR दर्ज हुई ।
जिससे यह विवाद प्रेस की स्वतंत्रता से भी जुड़ गया।
विवाद की असली शुरुआत: नामांकन रद्द
पूरे विवाद की जड़ चुनावी प्रक्रिया के दौरान हुई एक घटना बताई जा रही है।
29 जनवरी 2026
अजय पासवान ने SC आरक्षित सीट के लिए:
* जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत कर
* नामांकन फॉर्म खरीदा।
2 फरवरी 2026
अजय पासवान के अनुसार उन्होंने:
* अपना नामांकन फॉर्म जमा किया
* लेकिन उन्हें चेक स्लिप नहीं दी गई।
यह वही स्लिप होती है जो नामांकन स्वीकार होने की पुष्टि करती है।
स्क्रूटनी के दिन बड़ा विवाद
5 फरवरी 2026
नामांकन की जांच (स्क्रूटनी) के दौरान RO ने कहा:
आपके फॉर्म के साथ जाति प्रमाणपत्र की कॉपी संलग्न नहीं है।”
अजय पासवान का दावा है कि उन्होंने उसी समय अपनी फाइल से मूल जाति प्रमाणपत्र निकालकर प्रस्तुत किया लेकिन आरोप है कि RO ने उसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
इसके बाद उनका नामांकन रद्द कर दिया गया।
इस फैसले के कारण चुनाव लगभग एकतरफा हो गया।
क्या कहती है निर्वाचन नियमावली
झारखंड राज्य निर्वाचन आयोग की रिटर्निंग ऑफिसर हैंडबुक 2023 के अनुसार:
स्क्रूटनी के दौरान प्रत्याशी को दस्तावेज़ प्रस्तुत करने का अवसर दिया जा सकता है
छोटी तकनीकी कमी होने पर तुरंत सुधार की अनुमति दी जा सकती है
इसी कारण इस मामले में प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे।
FIR और प्रशासनिक कार्रवाई
सूत्रों के अनुसार:
6 फरवरी 2026 को RO पंकज कुमार की ओर से आवेदन दिया गया
जिसके बाद जल्दबाजी में 6/2/26 FIR दर्ज होने की बात सामने आई
इस FIR में अजय पासवान और RBC न्यूज़ के एंकर को आरोपी बनाया गया।
हालाँकि इस FIR के आधार और समय को लेकर स्थानीय स्तर पर कई सवाल उठ रहे हैं।
पुलिस प्रेस कॉन्फ्रेंस
मामले के बीच पलामू की पुलिस कप्तान रिश्मा रमेशन ने प्रेस वार्ता की।
वार्ता के अनुसार उन्होंने कहा:
अभी मेरे पास FIR कॉपी नहीं आई है।
यह बयान सामने आने के बाद पूरे घटनाक्रम की टाइमलाइन को लेकर नई बहस शुरू हो गई।
मामला पहुँचा हाई कोर्ट
प्रशासनिक स्तर पर राहत न मिलने के बाद अजय पासवान ने अंततः झारखंड उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल कर दी।
याचिका में निम्न पक्षों को शामिल किया गया है:
*ऑब्जर्वर वा संबंधित
* Co पंकज कुमार सह RO
* जिला प्रशासन
* राज्य निर्वाचन आयोग
⏳ सुनवाई से पहले पुलिस नोटिस
मामले की अगली सुनवाई 10 मार्च को निर्धारित है।
लेकिन इसी बीच अजय पासवान को 11 मार्च को थाने में उपस्थित होने का नोटिस दिया गया है।
इस टाइमिंग को लेकर स्थानीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं।
प्रेस स्वतंत्रता पर बहस
इस मामले ने एक और महत्वपूर्ण सवाल खड़ा कर दिया है।
क्या चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाने वाले पत्रकार या न्यूज़ ब्लॉगर पर FIR दर्ज होना प्रेस की स्वतंत्रता को प्रभावित करता है?
भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों और मीडिया को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है
अब सबकी नजर 10 मार्च पर
पूरा मामला अब न्यायपालिका के सामने है।
10 मार्च को होने वाली सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि:
* नामांकन रद्द करने की प्रक्रिया सही थी या नहीं
* पुलिस कार्रवाई कानून के अनुरूप थी या नहीं
* और क्या प्रशासनिक निर्णय निष्पक्ष थे।
हुसैनाबाद का यह मामला अब स्थानीय चुनावी विवाद से आगे बढ़कर कानूनी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की परीक्षा बन चुका है।
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