बिना नोटिस, बिना आदेश: एक 75 वर्षीय बुज़ुर्ग महिला को सर्द रात में बेघर करने की कहानी hussainabad news today
हुसैनाबाद पलामू
इजराय 12/14 में प्रशासन द्वारा डिक्री धारियों को शांतिपूर्ण ढंग से दखल दिलाने की कार्रवाई की गई। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में जो सबसे गंभीर और चिंताजनक पहलू सामने आया, वह यह था कि 13/18 की याचिकाकर्ता, वृद्ध और अनपढ़ महिला हसीना खातून को बिना किसी नोटिस, बिना कोर्ट के आदेश और बिना कानूनी प्रक्रिया के उनके पैदाइशी घर से जबरन निकाल दिया गया।
यह घटना न केवल कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं को भी झकझोर देती है।
प्रशासन के सामने रखी गई फरियाद, फिर भी अनसुनी
पीड़िता हसीना खातून ने प्रशासन की मौजूदगी में नियुक्त मजिस्ट्रेट के समक्ष अपनी बात पूरी शांति और विनम्रता से रखी। उन्होंने सभी आवश्यक दस्तावेज़ प्रस्तुत किए—
* आधार कार्ड
* राशन कार्ड
* स्वयं व बच्चों के पहचान पत्र
* बच्चों की मैट्रिक तक की शिक्षा से जुड़े प्रमाण
* 11 डिसमिल भूमि की राजस्व रसीद
हसीना खातून ने बताया कि **खाता संख्या 9, प्लॉट संख्या 127 पर बना यह आवासीय मकान उनका पैदाइशी घर है जहाँ वे अपने माता-पिता के जीवनकाल से रह रही हैं। उनके बेटे-बेटी की शादी-ब्याह, हर छोटा-बड़ा पारिवारिक कार्यक्रम इसी घर में शांतिपूर्वक संपन्न हुआ है।
इतना ही नहीं, उन्होंने वर्तमान में चल रहे मिसलेनियस केस की नकल भी मजिस्ट्रेट को दिखाई लेकिन इसके बावजूद प्रशासन ने उनकी एक न सुनी।
सात डिग्री से कम तापमान में सड़क पर बिताई रात
कार्रवाई के बाद हसीना खातून को उनके छोटे-छोटे बच्चों और बहू के साथ कड़ाके की ठंड में, जब तापमान सात डिग्री से भी नीचे था, सड़क किनारे रात बिताने को मजबूर होना पड़ा।
यह दृश्य किसी भी संवेदनशील समाज के लिए शर्मनाक है।
घर का सामान सड़क पर फेंका गया, सूची तक नहीं बनी
पीड़िता का आरोप है कि डिक्री धारियों ने अपने परिजनों की मदद से घर का सारा सामान सड़क किनारे फेंक दिया, और यह सब प्रशासन की मौजूदगी में हुआ।
सबसे गंभीर बात यह रही कि—
* सामान की जब्ती सूची (Seizure List) नहीं बनाई गई
* सोने-चांदी के बहुमूल्य आभूषण जो उन्हें पूर्वजों से प्राप्त हुए थे, गायब हो गए
* प्रशासन ने इस पर कोई संज्ञान नहीं लिया
बुलडोज़र चलाने का प्रयास: डर और दहशत का माहौल
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, घर खाली कराने और सामान फेंकने के बाद प्रशासन की मौजूदगी में बुलडोज़र चलाने का भी प्रयास किया गया जिससे पीड़ित परिवार पूरी तरह दहशत में आ गया।
सवाल जो जवाब मांगते हैं
यह घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है—
* क्या बिना नोटिस और कोर्ट के आदेश के किसी नागरिक को घर से निकाला जा सकता है?
* क्या एक 75 वर्षीय वृद्ध, अनपढ़ महिला की फरियाद को इस तरह नज़रअंदाज़ किया जाना उचित है?
* क्या प्रशासन की मौजूदगी में सामान फेंकना और कीमती वस्तुओं का गायब होना कानूनन सही है?
* क्या मानवीय संवेदना अब प्रशासनिक कार्रवाई से बाहर हो चुकी है?
निष्कर्ष
हसीना खातून की यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही और मानवीय मूल्यों की परीक्षा है।
जरूरत है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच हो, पीड़िता को न्याय और पुनर्वास मिले, और भविष्य में किसी भी नागरिक के साथ ऐसा अन्याय न हो।

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